मौसम से बाते
कल से ये हवा ने ना जाने क्या,
बेरुखी सी अपनाई है ।
जहाँ कल मौसम लेता था मस्ती की, अंगड़ाई सी ,
आज सिर्फ़ तनहाई है; और तनहाई है ।
ना जाने कहाँ से हवा ने झुटपुट ,
सी अश्क पाई थी ।
सूर्य की उष्मा से ये धरती,
तो ना सहलाई थी ?
ले गया ये बादल मेरे उष्मा के,
उस स्रोत को ;
जीसकी ठंड़ी धूप मे मैं ,
चल रहा था , पल रहा था ।
और छोड़ गया मुझे उस लौ में ,
तप्त होने को ;
जो उसकी थी ,
और मैनें पाई थी ।
लोग मुझे कहते है बीमार ,
पर ये तो है सिर्फ़, उस धूप का खुमार ,
बताओ ! बताओ की कब धूप में , फ़सल उगाने वाले ने ,
छाये में जश्न मनाई थी ।
- कमल कान्त गुप्ता